रौशनी और आशा

रौशनी और आशा
तुम्हे हमेशा से शिकायत रहती थी कि मैं तुम्हारा असल नाम क्यों नहीं ले पाता. “रौशनी” इतना भी मुश्किल नहीं हैं मेरा नाम, यह हमारे हर झगड़े की शुरुआत में तुम्हारा कहना होता था. मगर मेरा यकीन मानो कि मैंने लाख कोशिश की. फिर भी, पता नहीं क्यों, बार बार मेरे जुबान से “आशा” ही निकल जाता था. वैसे तुम मेरे लिए आशा ही हो. उस अंतहीन सुरंग के दूर छोर पर चमकती हुई, जिसकी वजह से वो सुरंग इतनी दूभर नहीं लगती और जिसे आज फिर मैंने “रौशनी” पुकारना चाह, मगर आज फिर जुबान से “आशा” ही निकला.

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